Tuesday, November 30, 2010

बाबरी मस्जिद

 एक जमाने में 'रथयात्रा' के कारण जगह-जगह सांप्रदायिक उन्माद पैदा हुआ और दंगे हुए जिनमें सैकड़ों निरपराध व्यक्ति मारे गए जिनका 'रथयात्रा' से कोई लेना-देना नहीं था, क्या ये मौतें आडवाणी की यात्रा का लक्ष्य स्पष्ट नहीं करतीं ?
आडवाणी ने यह भी कहा था  'मंदिर बनाने की भावना के पीछे बदला लेने की भावना नहीं है!' अगर ऐसा नहीं था तो फिर अधिकांश स्थानों पर मुसलमानों के खिलाफ नारे क्यों लगाए गए? क्यों निरपराध मुसलमानों पर हमले किए गए उनके जानो-माल का नुकसान किया (इस क्रम मेंअनेक हिंदू भी मारे गए)।
दूसरी बात यह है कि इतिहास की किसी भी गलती के लिए आज की जनता से चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान से उत्तर औ समर्थन क्यों मांगा जा रहा है? आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक स्व. बाला साहब देवरस ने 29 दिसंबर 1990 को कहा था कि मैं मुसलमानों से सीधा प्रश्न पूछता हूं कि क्या वे अतीत में 'मंदिर को तोड़े जाने की स्वीकृति देते हैं' अगर नहीं तो 'वे क्या इस पर खेद व्यक्त करते हैं' यानी कि जो मुसलमान इस प्रश्न का सीधा उत्तर 'ना' में दे? उसका भविष्य ...? क्या होगा इस पर सोचा जा सकता है। मैं यहां एक प्रश्न पूछता हूं कि क्या आरएसएस के नेतागण हिंदू राजाओं के द्वारा मंदिर तोड़े जाने खासकर कल्हण की राजतरंगिणी में वर्णित राजा हर्ष द्वारा मंदिर तोड़े जाने की बात के लिए 'हिंदुओं से सीधा प्रश्न करके उत्तर चाहेंगे?' क्या वे 'हिंदुओं से बौद्धों एवं जैनों के मंदिर तोड़े जाने का भी सीधा उत्तर लेने की हिमाकत कर सकते हैं?' असल में, यह प्रश्न ही गलत है तथा सांप्रदायिक विद्वेष एवं फासिस्ट मानसिकता से ओतप्रोत है।
आडवाणी एवं आरएसएस के नेताओं ने इसी तरह के प्रश्नों को उछाला है और फासिस्ट दृष्टिकोण का प्रचार किया है। आडवाणी ने कहा था कि वे हिंदू सम्मान को पुनर्स्थापित करने के लिए रथयात्रा लेकर निकले हैं। 30 सितंबर को मुंबई में उन्हें 101 युवाओं के खून से भरे कलश भेंट किए गए थे। इन कलशों में बजरंग दल के युवाओं का खून भरा था। यहां यह पूछा जा सकता है कि 'युवाओं के खूनी कलश' क्या सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक थे? या सांप्रदायिक एवं फासिस्ट विद्वेष के? आखिर बजरंग दल के 'मरजीवडों' को किस लिए तैयार किया गया? क्या उन्होंने राष्ट्रीय एकता में अवदान किया अथवा राष्ट्रीय सद्भाव में जहर घोला?
आडवाणी एवं अटल बिहारी वाजपेयी ने जो घोषणाएं 'राम जन्मस्थान' की वास्तविक जगह के बारे में की थीं, वह भी सोचने लायक हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स के 18 मई 1989 के अंक में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 'उस वास्तविक जगह को रेखांकित करना मुश्किल है, जहां हजारों वर्ष पूर्व राम पैदा हुए थे,' जबकि इन्हीं वाजपेयीजी ने 24 सितंबर 1990 को हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि 'राम का एक ही जन्मस्थान' है। यहां सोचा जाना चाहिए कि 18 मई 1989 तक कोई वास्तविक जगह नहीं थी, वह 24 सितंबर 1990 तक किस तरह और किस आधार पर जन्मस्थान की जगह खोज ली गई ? इसी तरह लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि 'यह कोई साबित नहीं कर सकता कि वास्तविक जन्मस्थान की जगह कौन-सी है। पर यह 'आस्था' का मामला है जिसको सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती' (द इंडिपेंडेंट 1 अक्टूबर 1990) यानी मामला आस्था का है, वास्तविक सच्चाई से उसका कोई संबंध नहीं है।
आडवाणी ने लगातार यह प्रचार किया कि बाबर हिंदू विरोधी था, हिंदू देवताओं की मूर्ति तोड़ता था, वगैरह-वगैरह। इस संदर्भ में स्पष्ट करने के लिए दस्तावेजों में 'बाबर की वसीयत' दी है, जो बाबर के हिंदू विरोधी होने का खंडन करती है। वे तर्क देते हैं कि 'देश बाबर और राम में से किसी एक को चुन ले'। आडवाणी के इससे तर्क के बारे में पहली बात तो यह है कि इसमें से किसी एक को चुनने और छोड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता। बाबर राजा था, यह इतिहास का हिस्सा है। राम अवतारी पुरूष थे, वे सांस्कृतिक परंपरा के अंग हैं। अत: इन दोनों में तुलना ही गलत है। दूसरी बात यह कि हिंदुस्तान के मुसलमानों में आज कोई भी बाबर को अपना नेता नहीं मानता, आडवाणी स्पष्ट करें कि किस मुस्लिम नेता ने बाबर को अपना नायक कहा है ? अगर कहा भी है तो क्या उसे देश के सभी मुसलमान अपना 'नायक' कहते हैं ?
एक अन्य प्रश्न यह है कि आडवाणी हिंदुओं को एक ही देवता राम को मानने की बात क्यों उठा रहे हैं? क्या वे नहीं जानते कि भारतीय देवताओं में तैंतीस करोड़ देवता हैं, चुनना होगा तो इन सबमें से हिंदू कोई देवता चुनेंगे? सिर्फ एक ही देवता राम को ही क्यों मानें? आडवाणी कृत इस 'एकेश्वरवाद' का फासिज्म के 'एक नायक' के सिद्धांत से गहरा संबंध है।
हाल ही में जब पत्रकारों ने आडवाणी से पूछा कि वह कोई राष्ट्रीय संगोष्ठी मंदिर की ऐतिहासिकता प्रमाणित करने के लिए आयोजित क्यों नहीं करते? जिसमें समाजविज्ञान, पुरातत्त्व, साहित्य आदि के विद्वानों की व्यापकतम हिस्सेदारी हो तो उन्होंने कहा कि ऐसे सेमीनार तो होते रहे हैं। पत्रकारों ने जब उत्तर मांगा कि कहां हो रहे हैं? तो आडवाणीजी कन्नी काटने लगे। 16 दिसंबर 1990 के स्टेट्समैन अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक आडवाणी ने कहा कि कुछ महीने पहले मैंने महत्वपूर्ण दस्तावेजों से युक्त एक पुस्तक जनता के लिए जारी की है जिसे बेल्जियम के स्कॉलर कोनार्ड इल्स्ट ने लिखा है। नाम है- राम जन्मभूमि वर्सेंज बाबरी मस्जिद। मैंने इस पुस्तक को कई बार गंभीरता से देखा-पढ़ा एवं आडवाणीजी के बयानों से मिलाने की कोशिश की तो मुझे जमीन आसमान का अंतर मिला।
आडवाणी इस पुस्तक को महत्वपूर्ण मानते हैं तथा बाबरी मस्जिद विवाद पर यह पुस्तक उनके पक्ष को पेश भी करती है, यह उनका बयान है। आइए, हम आडवाणी के दावे और पुस्तक के ले¹क के दावे को देखें
आडवाणी का मानना है कि राम का जन्म वहीं हुआ है जहां बाबरी मस्जिद है, राम मंदिर तोड़कर बाबर ने मस्जिद बनाई, अत: 'राष्ट्रीय' सम्मान के लिए मस्जिद की जगह मंदिर बनाया जाना चाहिए। बेल्यिजम के इस तथाकथित 'स्कॉलर' या विद्वान ने अपनी पुस्तक में बहुत सी बातें ऐसी लिखा हैं, जिनसे असहमत हुआ जा सकता है, यहां मैं समूची पुस्तक की समीक्षा के लंबे चक्कर में नहीं जा रहा हूं, सिर्फ लेक का नजरिया समझाने के लिए एक-दो बातें र रहा हूं। लेक ने अपने बारे में कहा है कि वह 'कैथोलिक पृष्ठभूमि' से आता है पर उसने यह नहीं बताया कि आजकल उसकी पृष्ठभूमि या  पक्षधरता क्या है? क्या इस प्रश्न की अनुपस्थिति महत्वपूर्ण नहीं है?
एक जमाने में आरएसएस के गुरू गोलवलकर ने बंच ऑफ पॉटस में हिंदुत्व के लिए तीन अंदरूनी तरों का जिक्र किया था, ये थे-पहला मुसलमान, दूसरा ईसाई और तीसरा कम्युनिस्ट। क्या यह संयोग है कि बेल्जियम के विद्वान महाशय ने बाबरी मस्जिद वाली पुस्तक में लिखा है कि 'हिंदू विरोधी प्रचारक हैं ईसाई, मुस्लिम और मार्क्सवादी'! क्या लेक के दृष्टिकोण में और गोलवलकर के दृष्टिकोण में साम्य नहीं है? क्या इससे उसकी मौजूदा पृष्ठभूमि का अंदाजा नहीं लगता। खै, चूंकि आडवाणी इस विद्वान की पुस्तक का समर्थन कर रहे हैं तो यह तो देना होगा कि आडवाणी क्या पुस्तक की बातों का समर्थन करते हुए अपना फैसला बदलेंगे। बेल्जियम के विद्वान ने प्राचीन मार्गदर्शक अयोध्या माहात्म्य में राम मंदिर का जिक्र नहीं है- इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए लिखा है कि -'यह बताया जा सकता है, पहली बात तो यह कि अयोध्या माहात्म्य से संभवत: राम मंदिर का नाम लिने से छूट गया हो, यह तो प्रत्यक्ष ही है। अपने इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए विद्वान लेखक ने इस बात को रेखांकित किया है कि 'बाबर के किसी आदमी ने जन्मभूमि मंदिर' नहीं तोड़ा। सवाल उठता है क्या आडवाणी अपने फैसले को वापस लेने को तैयार हैं? क्योंकि उनके द्वारा जारी पुस्तक उनके तर्क का समर्थन नहीं करती। इस पुस्तक में साफ तौर पर विश्व हिंदू परिषद् के तर्कों से उस सिद्धांत की धज्जियां उड़ जाती हैं कि राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। चूंकि, आडवाणी इस पुस्तक पर भरोसा करते हैं, अत: वे इसके तथ्यों से भाग नहीं सकते। आडवाणी का मानना है कि बाबरी मस्जिद में 1936 से नमाज नहीं पढ़ी गई, बेल्जियम का विद्वान इस धारणा का भी खंडन करता है और कहता है कि 'हो सकता है, नियमित नमाज न पढ़ी जाती हो, यदा-कदा पढ़ी जाती हो, पर 1936 से नमाज जरूर पढ़ी जाती थी।' एक अन्य प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए लेक ने लिखा है कि 'यह निश्चित है कि विहिप द्वारा 'हिंदुत्व' को राजनीतिक चेतना में रूपांतरित करने की कोशिश की जा रही है, उसे इसमें पर्याप्त सफलता भी मिली है। यह भी तय है कि राम जन्मभूमि का प्रचार अभियान इस लक्ष्य में सबसे प्रभावी औजार है, 'विहिप' अपने को सही साबित कर पाएगी: यह भविष्य तय करेगा, पर उसने कोई गलती नहीं की। हम हिंदू राष्ट्र बनाएंगे और इसकी शुरूआत 9 नवंबर 1989 से हो चुकी है।' यानी कि आडवाणी के द्वारा बतलाए विद्वान महाशय का यह मानना है कि यह सिर्फ राम मंदिर बनाने का मसला नहीं है, बल्कि यह हिंदू राष्ट्र निर्माण की कोशिश का सचेत प्रयास है। क्या यह मानें कि आडवाणी अब इस पुस्तक से अपना संबंध विच्छेद करेंगे? या फिर बेल्जियम के विद्वान की मान्यताओं के आधार पर अपनी नीति बदलेंगे। असल में, बेल्जियम के लेक की अनैतिहासिक एवं सांप्रदायिक दृष्टि होने के बावजूद बाबरी मस्जिद बनाने संबंधी धारणाएं विहिप एवं आडवाणी के लिए गले की हड्डी साबित हुई हैं। वह उस प्रचार की भी पोल खोलता है कि विहिप एवं भाजपा तो सिर्फ राम मंदिर बनाने के लिए संघर्ष कर रहें हैं। यह वह बिंदु है जहां पर आडवाणी अपने ही बताए विद्वान के कठघरे में ड़े हैं।


साम्प्रदायिकता

          
इधर लगातार कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं जिनसे जनतंत्र के पक्षधरों का चिंतित होना स्वाभाविक है। अभी हाल में नई दिल्ली स्थित एक टीवी चैनल पर कतिपय लोगों ने इसलिए हमले किए हैं कि उसके द्वारा रिपोर्ट-विशेष का प्रसारण पसंद न था। इसके पूर्व केरल के एक प्रोफेसर पर आक्रमण किया गया क्योंकि उसके द्वारा तैयार प्रश्न पत्र पर आपत्ति थी क्योंकि वह हमलावरों की आस्था को ठेस पहुंचाता था। कुछ साल पहले मैंगलोर में नवयुवकों और नवयुवतियों के साथ-साथ रेस्तरां में जाने पर आपत्ति जताने वालों ने उन्हें मारा-पीटा था। आज से आठ साल पहले अयोध्या स्थित लगभग पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को एक संप्रदाय विशेष की तथाकथित भावनाओं का अपमान मानकर ध्वस्त कर दिया गया। ऐसा करने वालों ने इस बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया कि इससे देश की एकता और जनतंत्र का कितना नुकसान होगा। इतना ही नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को धत्ता बताया गया । कहना न होगा कि ये सब घटनाएं एक खतरनाक प्रवृत्ति को इंगित करती हैं। 
सर्वविदित है कि सहनशीलता एक अत्यंत महत्वपूर्ण मानवोचित गुण है। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति को अन्य लोगों के साथ विचार-विभिन्नता के बावजूद सहिष्णु होना चाहिए। अगर हम मानते हैं कि उनके दृष्टिकोणों और विचारों में खामियां हैं तो शालीनता के साथ बतलाएं और बदलाव लाने का विनम्र आग्रह करें। यहां जोर-जबरदस्ती के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। धौंस दिखाकर लाया गया बदलाव टिकाऊ नहीं होता और न ही हम दूसरों का हृदय जीत सकते हैं।
यदि शास्त्रार्थ द्वारा हम अपने प्रतिपक्षी को अपने विचारों का कायल बनाने में असमर्थ हैं तो इस बात के लिए तैयार हों कि हम अपने-अपने विचारों पर कायम रहें मगर भविष्य में शास्त्रार्थ का द्वार खुला रखें।
असहनशीलता प्राय: सबसे अधिक धार्मिक मामलों में देखी जाती है क्योंकि वहां तर्क और खुलापन का अभाव होता है। प्रचलित विचारों और मान्यताओं को ईश्वर प्रदत्त कहकर तार्किक कसौटी से परे रखा जाता है। बर्ट्रेड रसेल ने अपनी पुस्तक 'व्हाई आई एम नॉट ए क्रिश्चियन?' में बतलाया है कि हर धर्मावलंबी ईश्वर की सत्ता को स्वीकारने के साथ ही यह मानता है कि उसका धर्म अन्य से श्रेष्ठतर है तभी तो वह अपना धर्म नहीं छोडता और दूसरों को धर्मांतरण करा अपनी जमात में लाना चाहता है।
कमोबेश यही बात गीता में मिलती है जहां श्रीकृष्ण अर्जुन को बतलाते हैं: 'श्रेयान सर्वधर्मो विगुण: परधर्मा त्स्वनुष्ठितात्। सर्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:॥' अपना धर्म बेहतर है और उसी में जीना-मरना चाहिए क्योंकि दूसरों का धर्म भयावह होता है। इस मान्यता से धर्मों के बीच टकराव की संभावना पैदा होती है।
अगर ईश्वर में विश्वास और उसे जगत्-नियंता मानकर चलें तो तर्कशास्त्र, विज्ञान और डार्विन का क्रमिक विकास का सिध्दांत कूडेदान में चले जाएंगे। अगर कोई इस धार्मिक रुढिवादिता को नकारता है तो धर्मांध लोगों के गुस्से का शिकार बनता है क्योंकि उनके लिए तथाकथित आस्था सर्वोपरि है।
इसी प्रकार यदि आप सामाजिक भेदभाव को चुनौती देते हैं तो आप पर ईश्वर और धर्मविरोधी होने का इल्जाम लग सकता है क्योंकि आप इस मान्यता को नकारते हैं कि वर्ण-व्यवस्था ईश्वर-सृजित है और इसे गीता में रेखांकित किया गया है। श्री कृष्ण कहते हैं : 'चातुरर््वण्यं मया सृज्या गुण कर्म विभागश:। तस्य कतरिमपि मां विध्दयकर्तारम व्ययम्॥'
तथाकथित धर्मनिष्ठ यह मानकर चलते हैं
कि गीता सहित अन्य धर्मग्रंथों में व्यक्त
विचार शाश्वत सत्य हैं और वे
कालनिरपेक्ष हैं। उनको चुनौती देने वाला ईश्वरद्रोही होने के कारण दंड का अधिकारी है। यहां प्रश्न उठता है कि क्या तर्कबुध्दि निरर्थक है। कहना न होगा कि यह मान्यता गलत है कि धर्मग्रंथ कालनिरपेक्ष हैं और उनमें वयक्त विचार हर समय समाज की परिस्थितियों को नजरअंदाज कर लागू किए जाने चाहिए। यह मान्यता सही नहीं है। उदाहरण के लिए गीता को लें। उसकी रचना एक युग विशेष में हुई थी जब उत्पादकता का स्तर बहुत निम्न था। अधिशेष उत्पादन नाम मात्र का था जिस कारण युध्दबंदी की अवधारणा नहीं थी तभी तो श्रीकृष्ण गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 37 में अर्जुन से कहते हैं कि यदि तुम जीत गए तो राज्य पाओगे और युध्द में मर गए तो स्वर्ग जाओगे। इस प्रकार लडाई घाटे का सौदा नही है। अगर हम बांग्लादेश की मुक्ति की लडाई को देखें तो पाएंगे कि पाकिस्तानी जनरल नियाजी उसमें न जीते, न मरे बल्कि युध्दबंदी होकर झारखंड के जंगलों में रहने को मजबूर हुए। गीता का काल होता तो उन्हें पकडे ज़ाने पर मार दिया जाता क्योंकि तब पर्याप्त अधिशेष उत्पादन के अभाव में युध्दबंदियों को खिलाना-पिलाना कठिन था और उत्पादन की प्रौद्योगिकी इतनी विकसित न थी कि उनसे गुलाम बतौर काम लिया जाता।
उपर्युक्त बातों को देखते हुए अगर कोई गीता की चिरंतता पर प्रश्न उठाता है तो उसे आस्था के ठेकेदारों का शिकार बनना होगा। क्या एक विवेकशील व्यक्ति को चुप रहना चाहिए? अगर नहीं तो उसे तय करना होगा कि वह सत्य और छद्म सत्य के बीच किसका साथ दे।
छद्म सत्य की बिना पर सांप्रदायिकता का जहर फैलाया जाता है, दंगे कराए जाते हैं, मंदिर-मस्जिद और गिरजाघर ढहाए जाते हैं। अगडी-पिछडी ज़ातियों और सवर्णों एवं दलितों को परस्पर लडाया जाता है।
इस संदर्भ में विवेक का क्या तकाजा है? चुपचाप सहिष्णुता दिखाएं या प्रतिरोध करें? वर्षों पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ क्योंकि एक गुट के लोगों ने वोट बटोरने के लिए आस्था की दुहाई देते हुए कहा कि राम का जन्म वहीं हुआ था जहां बाबरी मस्जिद खडी थी। किसी ने भी तथ्यों और प्रमाणों की फिक्र नहीं की। यह नहीं जांचा कि क्या राम पौराणिक पुरुष नहीं बल्कि वास्तविक व्यक्ति थे। अगर राम सचमुच हुए थे तो क्या वर्तमान अयोध्या उनकी जन्मस्थली थी जबकि कपितय विद्वान मानते हैं कि पौराणिक अयोध्या अफगानिस्तान में थी वहां की हरयू नदी ही सरयू थी। हमारी बहुत सारी पौराणिक गाथाएं यूनानी गाथाओं से मिलती हैं जिससे कई प्रश्न पैदा होते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि आर्य हमारी पवित्र भारत भूमि की पैदावार हैं जबकि ताजातरीन वैज्ञानिक शोध इसे नहीं मानता। नयन चंदा की पुस्तक 'बाउंड टूगेदर' में इसी के हवाले से मनुष्य की उत्पति अफ्रीका में बतलाई गई है जहां से लाखों वर्षों के क्रम में उसकी संतति झुंडों में जीविका की खोज में सारे विश्व में फैली। इस तरह मानव-मानव में फर्क करना गलत है और अवमानव की अवधारणा मिथ्या। हिटलर ने यहुदियों को अवमानव माना था जैसे हमारे संप्रदायवादी इतर धर्मावलंबियों को अवमानव मानकर प्रताडित करने में कोई संकोच नहीं दिखलाते।
इस स्थिति में कोई विवेकशील व्यक्ति प्रतिरोध करे या मूक बनकर रहे? जहां तक धर्मांधों का प्रश्न है वे सहनशीलता नहीं दिखाते। गुजरात की घटनाएं हों या कंधमाल की या फिर पादरी ग्राहम स्टेंस को बच्चों सहित जलाने की, संकेत इसी ओर है। मध्यकाल में रोमन कैथोलिक चर्च ने गैलीलियो, कोपरनिकस आदि अनेक वैज्ञानिकों को इसलिए सताया कि जिन धारणाओं को वह सत्य कहकर प्रचारित कर रहा था उन्हें उन्होंने गलत बतलाया। हमारे यहां इसका उदाहरण याज्ञवलक्य-गार्गी संवाद के क्रम में मिलता है। जब ऋषि शास्त्रार्थ के क्रम में गार्गी के प्रश्नों के उत्तर देने में लाचार हो गए तब उन्होंने उसे यह कहकर चुप करा दिया कि अगर वह प्रश्नों का क्रम जारी रखेगी तो उसका सिर धड से अलग होकर जमीन पर गिर जाएगा।
एक बडे चिंतक ला रोशे फुको के शब्दों में कहें तो : 'सत्य से दुनिया का उतना भला नहीं होता जितना छद्म सत्य से उसका नुकसान होता है।' अत: छद्म सत्य या झूठे सच के प्रति कोई सहिष्णुता नहीं दिखाते हुए उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। हो सकता है कि इस प्रतिरोध के क्रम में उत्पीडन और यंत्रणा का शिकार होना पडे। रास्ता कठिन मगर विकल्पहीन है।
वर्ष 1994 में छपी लिज नोवेल की पुस्तक 'इंटोलेरेंस : ए जनरल सर्वे' में रेखांकित किया गया है कि सोलहवीं सदी से ही जब मानवतावादियों ने विचार और कर्म की स्वतंत्रता को बढावा देना शुरू किया जिससे वे अपनी धार्मिक सहिष्णुता की भावना की रक्षा कर सकें, असहिष्णुता को मूलत: किसी मत या आचरण की अनुचित भर्त्सना के रूप में परिभाषित किया गया है। पुस्तक में स्पष्ट किया गया है कि उत्पीडित लोगों की वर्तमान अवस्था में कोई भी परिवर्तन नहीं आने देने के उद्देश्य से उत्पीडक़ की हर कोशिश उसकी याददास्त को धुंधला बनाने की होती है। उसको इतना निर्जीव बनाया जाता है कि वह अपनी पहचान और अपनी जडों को भूल जाए। उत्पीडित को इतिहास से निर्वासित कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में अगर वह सहिष्णु बन सब कुछ झेलता जाए तो उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सकता। प्रसिध्द राजनीतिक शास्त्री हरबर्ट मार्क्यूस ने एक लेख में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया  है कि सहिष्णुता के उद्देश्य को पाने के लिए अधिकतर प्रचलित नीतियों, रूझानों, दृष्टिकोणों और विचारों तथा कार्य-व्यापारों के प्रति असहनशीलता दिखानी होगी। इसी तरह सहनशीलता और असहनशीलता साथ-साथ चलती है। जो सब तर्कशास्त्र के नियमों और विवेकबुध्दि की कसौटी पर खरा नहीं उतरता उसको नकारना चाहिए और उसके प्रति सहिष्णुता नहीं दिखाई जा सकती। मगर उसकी अभिव्यक्ति तर्कों द्वारा ही होनी चाहिए, हिंसा के रास्ते से नहीं। निरंतर प्रयास से लोगों को तर्क संगत विचारों का कायल निश्चित रूप से बनाया जा सकता है।

 ( गिरीश मिश्रा जाने-माने समाजविज्ञानी )

kasmir

Monday, October 18, 2010


कश्मीर समस्या को लेकर बनाई गई फिल्में इसलिए सफल नहीं होतीं

कश्मीर समस्या को लेकर बनाई गई फिल्में इसलिए सफल नहीं होतीं, कि उनमें पूरा सच नहीं होता। कश्मीर को लेकर कई तरह के सच हैं। श्रीनगरClick here to see more news from this city के "टूरिस्ट सेंटर" में आतंकियों ने आग लगा दी थी। वे श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा शुरू किए जाने का विरोध कर रहे थे। तब टूरिस्ट सेंटर से लाइव रिपोर्टिंग कर रही थीं बरखा दत्त। बरखा का अनुमान था कि टूरिस्ट सेंटर के आस-पास खड़ी कश्मीरी जनता आतंकवादियों की इस हरकत की विरोधी है। सो उन्होंने लाइव रिपोर्टिंग के दौरान ही एक कश्मीरी से पूछ लिया कि इस हमले को लेकर आपके क्या विचार हैं। विचार जो थे, वो भारत विरोधी थे। उस आदमी ने भारत विरोधी बातें कहीं। बरखा दत्त ने फौरन उससे माइक लिया और कहा - कश्मीर में इस तरह की सोच भी कुछ लोग रखते हैं चलिए आपको वापस स्टूडियो लिए चलते हैं। बरखा दत्त जैसी अनुभवी रिपोर्टर के भी हाथ-पैर फूल गए थे। टीवी पर फिर वो फुटेज नहीं दिखाया गया। कश्मीरी जनता से अकसर लाइव बातचीत नहीं दिखाई जाती और इसकी शिकायत भी कश्मीर के लोग करते हैं।

कश्मीर के अलग-अलग सच हैं। फिल्मकार क्या दिखाए और क्या नहीं? न सच गले उतरता है न झूठ को दिल कबूल करता है। कुछ कश्मीरी हैं, जो पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं। कुछ कश्मीरी हैं, जो चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान, दोनों ही उनका पिंड छोड़ दें और कश्मीर एकदम छुट्टा आजाद हो जाए। कुछ कश्मीरी अपना मुस्तकबिल भारत के साथ बने रहने में देखते हैं। नाराजगियाँ हैं और खूब हैं।

अधिकांश फौजियों की निगाह से कश्मीर का हर बाशिंदा आतंकवादी या आतंकियों को पनाह देने वाला है। आम कश्मीरी की नजर में हर फौजी जुल्म करने वाला है। घाटी छोड़ चुके कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर का सच अलग है और कश्मीर के गाँवों में रहने वाले उन मासूमों के लिए अलग, जिनके लिए आतंकवादी भी उतने ही डरावने हैं जितने वर्दी वाले लोग।

कश्मीर के बाहर की सियासी पार्टियों के लिए कश्मीर देशभक्ति का भावनात्मक मुद्दा है। कश्मीर के अंदर की सियासी पार्टियाँ आजादी और खुदमुख्तारी का जाप करती हैं। गिलानी जैसा नेता पाकिस्तान का पिछलग्गू है, तो शब्बीर शाह भारत और पाकिस्तान, दोनों ही से आजादी की बात करने वाला। राज्य एक ही है, पर जम्मूClick here to see more news from this city का आदमी अलग बात करता है और कश्मीर का अलग। लेह-लद्दाख वालों की तो कोई सुनता भी नहीं।

किसी फिल्मकार में इतना साहस और कौशल नहीं है, जो सारे सच समेट ले और सबको इस तरह सामने रखे कि कोई विवाद न हो। लिहाजा "मिशन कश्मीर" जैसी घटिया फिल्में बनती हैं, जो समस्या को छूती तक नहीं, बस समस्या को मिले प्रचार का लाभ उठाती हैं।

अफसोस की बात है कि "परजानिया" बनाकर नाम कमाने वाले राहुल ढोलकिया ने भी "लम्हा" इसी तरह बनाई है। समस्या को सतही ढंग से छूती हुई, देखी-अनदेखी करती हुई। कश्मीर का सच कोई एक फिल्म नहीं दिखा सकती। एक कश्मीरी पत्रकार ने ड्रामा लिखकर कश्मीर की उन महिलाओं की समस्या उठाई है, जिन्हें हाफ विडो यानी "आधी विधवा" कहा जाता है। हाफ विडो यानी वे महिलाएँ जिनके पतियों को फौज, पुलिस या सुरक्षाबल के जवान "पूछताछ" के लिए ले गए और फिर उनका कोई अता-पता नहीं है। घाटी में ऐसी हजारों विधवाएँ हैं। लापता हुए लोगों के परिजन श्रीनगर में लगातार मिलते रहते हैं और सभाएँ करते रहते हैं।

तो इस तरह कश्मीर की समस्या को एक के बाद एक देखा जा सकता है। जिस समस्या को देखने के लिए हजारों ईमानदार वृत्त चित्रों की जरूरत है, उसे आप ढाई घंटे की उस फिल्म में नहीं देख सकते जिसमें चार-पाँच गाने भी हों और अनिवार्य रूप से नायक नायिका को इश्क भी लड़ाना हो।

दीर्घतमा  से

Thursday, November 25, 2010

हिंदी कहानियां और उनका प्रकाशन वर्ष

हिंदी उपन्यास इन्सैक्लोपिडिया

  • भारत विभाजन सम्बन्धी हिंदी उपन्यास
१. और इन्सान मर गया ----रामानंद सागर --नव हिंद पब्लिकेशन,दिल्ली --- सन १९४६
२. देश की हत्या--------------गुरुदत्त ---------                                              ---  सन १९४८
३.


हिंदी उपन्यास

१. रागदरबारी (साहित्य अकादमी पु०)--- श्रीलाल शुक्ल --- 1968 ई०
२. अज्ञातनामा   ---   श्रीलाल शुक्ल -- -
३. लोग (पहला उपन्यास) ---   गिरिराजकिशोर   --- 
४. ढाईघर (साहित्य अकादमी पु०) ---  गिरिराजकिशोर --- 
५. जुगलबंदी                                  ---गिरिराजकिशोर --- 1973 ई०
६. शहर दर शहर   ----    गिरिराजकिशोर ---
७. मशाल  ----           --- भैरवप्रसाद  गुप्त 
८. गंगा मैया ---    भैरवप्रसाद  गुप्त ---
९. नया आदमी ---  भैरवप्रसाद  गुप्त --- 
१०. आपका बंटी  ---   मन्नू भंडारी   ---
११. महाभोज       ---  मन्नू भंडारी  ---