Monday, April 25, 2011

बात एकदम सही है.सत्य साईं की जीवनी पर प्रकाश न डालकर उन्हें भगवान बताया जा रहा है.उनके 5  चमत्कारों के बल पर मीडिया का झूठ तंत्र और पूंजिपत्तियों का अन्धविश्वास तंत्र उन्हें राम और कृष्ण के समकक्ष खड़ा कर दिया है.हलाकि साईं की सारी भविष्यवानियाँ झूठी साबित हो चुकी हैं.उन्होंने अपने मरने का साल 2022 घोषित की थी,मगर 11 साल पहले ही चल बसे .फिर भी अन्धविश्वास -तंत्र उनको भगवान साबित कर रहा है.सचिन का वर्ल्ड-कप में कैसा प्रदर्शन रहा ,यह किसी से छुपा नहीं है. क्या सचिन को वर्ल्ड-कप फ़ाइनल में बहुत खराब खेलने का कोई अफ़सोस नहीं? क्या उनके साईं ने उनका उस  समय कोई हेल्प नहीं किया?वर्ल्ड- कप हमने जिन खेलाडीओं के बेहतर प्रदर्शन के बदौलत जीते उनका कोई गुणगान नहीं.क्या सचिन सचमुच भगवान हैं?दूसरी बात अगर साईं भगवान हैं तो उन्हें बचाने के लिए साधारण डॉक्टर इतना प्रयास क्यों कर रहें हैं?भगवान तो दूसरो को बचाता है,यहाँ भगवान को ही बचाने के लिए लाखो -करोडो खर्च किया जा रहा है.40 हज़ार करोड़ की संपत्ति का कोई लेखा -जोखा नहीं रखा जाएगा ,क्योंकि वह भगवान की संपत्ति है.बड़े -बड़े आई ०एस अधिकारी अपनी नौकरी छोड़कर साईं की सेवा में भागे.समाज सेवा से बढ़कर साईं -सेवा.जो रहीम दीनही लखै सो दीनबंधु सम होय,सब झूठ.जांच होनी चाहिए कि ये अधिकारी कही अपने काले धन को छिपाने के लिए तो भगवान की सरन में नहीं गये?साईं के देश में 85 करोड़ जनता दो जून की रोटी के लिए बेहाल है.इनकी आमदनी 20 रूपये प्रतिदिन है. देश भ्रष्टाचार के सबसे भयानक दौर से गुजर रहा है.साईं अगर भगवान हैं तो इनमें  से एक भी समस्या क्यों दूर नहीं कर पाए.महंगाई के चलते लाखो लोगों ने आत्महत्या की .साईं ने उनके लिए कुछ क्यों नही किया?हजारो महिलाओं ,यहाँ तक कि मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार होता है.साईं ने इनमे से किसी के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठाई,जबकि उनके पास अपर जनता का समर्थन था.एक अन्ना जब भ्रष्टाचार के मुहीम में पुरे देश को एक कर सकते हैं तो फिर साईं तो भगवान थे.वे तो अपने आह्वान से भ्रष्टाचार के किलाफ़ मुकम्मल लड़ाई लड़ सकते थे.मगर चुपी क्यों?बाबा रामदेव के पास भी ट्रस्ट है,मगर वे भगवान बनाने का दावा नहीं करते ,अपनी समझ में देश सेवा एवं समाज सेवा कर रहे है और बेहतर काम कर रहे हैं.साईं अपने को सिर्डिः के साईं का अवतार बताते हैं,मगर  दोनों के जीवन चरित  एकदम विपरीत है.साईं ने अपने ट्रस्ट के माध्यम से जो समाज सेवा की वह ठीक है,मगर यह देखा जाना चाहिए कि इतना पैसा किस रास्ता से आया?उसका  प्रोफिट कहाँ जाता है?क्या साईं इस पैसे का उपयोग गरीब जनता की समस्याओ को दूर करने के लिए नहीं कर सकते थे अगर किया और भगवान होकर किया तो फिर देश में गरीबी क्यों बढाती गयी?मन्हान्गाई क्यों बढती गयी?लोग और गरीब क्यों होते गये?गरीब की किसी समस्या का निदान क्यों नहीं हुआ?उअसे अमीरों को ही केवल  लाभ क्यों होता गया और हो रहा है?अमीर और अमीर और गरीब और गरीब क्यों होते गये?ये सरे सवाल साईं या तथाकथित  भगवान को अगर बेचैन नही करते थे तो क्यों नहीं करते यहे?साईं एक महँ इन्सान हो सकते थे अगर अपने समाज सेवा के लक्ष्य को लेकर चलते.

Thursday, April 21, 2011

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अनशन किया,उसमें लगभग पूरा देश उनके साथ उठ खड़ा हुआ,क्योंकि यह लड़ाई केवल अन्ना की नही थी.भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरा देश खड़ा होना चाहता है.मगर सवाल वही कि पहले आवाज़ कौन उठाएगा?बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधेगा?जैसे ही किसी ने आवाज उठाई लोगों को उसमें अपनी आवाज़ दिखाई दी,बस लोगों ने बिना सोचे - समझे अन्ना के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया.मीडिया ने इसे खूब प्रोजेक्ट किया?मगर इस आन्दोलन की कुछ बुनियादी कमजोरियां अब दिखने लगी हैं और इसके पीछे छिपे मीडिया एवं सत्ता का खेल स्पष्ट रूप से सामने आने लगा है.अमर सिंह वाले सीडी विवाद के बाद दोनों भूषण को जन लोकपाल कमिटी से बिना किसी सफाई के इस्तीफ़ा दे देना चाहिए .कोरोड़ो की सम्पति हथियाने में कमोबेस करप्शन तो इनलोगों ने किया है.इन लोगों का  कमेटी में रहने का कोई नैतिक आधार नहीं है. भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी कमेटी में करोड़पत्ति रहें तो उनसे निष्पक्षता की उम्मीद करना बेकार है.उसमे ऐसे लोगो को रखा जाये जिनका जीवन इतिहास पाक-साफ एवं इमानदार रहा हो.मेधा पाटेकर ,अरुंधती राय, बाबा रामदेव, ए. पि. जे. अबदुलकलाम, नितीश कुमार, बुद्धदेव भट्टाचार्य,हालत यह कि इस देश में दस नाम खोजने में आंधी आ रहा है.कम-से-कम पहले चार नाम पर तो अधिकांश सहमत होंगे ही.बाकि जब इया मौजूदा लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के शिवाय कुछ नहीं बचा है तन इस भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बार बाबा रामदेव का फंदा आजमाना ही चाहिए.इसमें विवाद हो सकता है मगर एकबार आजमाकर देखा जाए .न कुछ से कुछ भला.बुद्धिजीवियों की बात समझ में नहीं आती है . एक तो ये कभी आवाज़ नहीं उठाते ,आवाज़ उठाते इनकी नानी मारती है ,आन्दोलन को तो ये बेवकूफी समझतें हैं,और जब कोई आवाज़ उठता भी है इअसमे पचासों खामियां निकलते हैं,स्वार्थ ढूंढ़ निकलते हैं ,मगर किसी भी समस्या का इनके पास कोई समाधान नहीं है.सबसे नकारे यही हैं.इनकी राय सुनी जय,मगर इनके नकारे से आंदोलनकारियो को घबडाना नही चाहिए.कोई भी मुहीम पूरी तरह पाक-साफ या बिना खामी की नहीं हो सकती .आन्दोलन शुरू हो धीरे-धीरे उसकी साडी खामियां दूर कर ली जाएँगी.मुहीम तो चले पहले.मुहीम मरण स्वार्थी लोग भी आएंगे ,संभव है कि वही आगे आजायें,मगर उनको पछाड़ते हुए उसमे मौजूद सही लोग आन्दोलन को सफलता कि ओर ले जा सकते हैं.मुहीम चले,बुद्धिजीवी उसकी कामिओ पर नजर रखें एवं उन कामिओ को दूर करने का सुझाव दे,उसके लिए संघर्ष करें उसे सही दिसा में ले जाएँ,उसमे सामिल स्वार्थी तत्वों कि पहचान करें एवं उनके स्वार्थ को नंगा करे.